जितना भी लिखू भगत सिंह के लिए उतना ही कम है
1 : जन्म: सितम्बर/अक्टूबर १९०७
2: शहीद : २३ मार्च १९३१
3: भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी थे। चन्द्रशेखर आजाद
व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इन्होंने देश की आज़ादी के लिए
अभूतपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। पहले लाहौर में साण्डर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। इन्होंने असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ( कुल दो केस में ) फाँसी पर लटका दिया गया। सारे देश में उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया जाता है।
4: उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था
5:यह एक जाट [{सिक्ख}] परिवार था। उनका परिवार पूर्णतः आर्य समाजी था।
6: जेल के दिन ---- जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे,
जेल में भगत सिंह ने १९६ दिनों व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ( जतिनदास ) ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।भगत सिंह इन दिनों जल/अन्न का त्याग करने के बावजूद किताबें पढ़ते थे और लेख लिखते रहते थे।
जेल में भगत सिंह ने १९६ दिनों व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ( जतिनदास ) ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।भगत सिंह इन दिनों जल/अन्न का त्याग करने के बावजूद किताबें पढ़ते थे और लेख लिखते रहते थे।
7: फांसी-----26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को ब्रिटिश दंड संहिता की धारा 129,
302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120
के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68
पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की
सजा सुनाई गई। फांसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा
दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील
दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा
माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का
प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें।
23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई।फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी
इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें
वह पूरी करने का समय दिया जाए।कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी
का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी
दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक
है अब चलो।"
फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे। मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥
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